Tuesday, 4 July 2017

                                                           दिमागी फ़ितूर:देह सुख 

रात के कुछ 11 बज रहे होंगे खाना खाके बिस्तर पे आया ही था..आदतन मोबाइल पे फेसबुक पेज स्क्रॉल किये जा रहा था कुछ को चाह कर लाईक कर रहा था तो कुछ को ना चाहते हुए भी..

अचानक एक पोस्ट पे नजर परी जिसे मैं बहुत उत्सुकता से पढने लगा पढ़ते पढ़ते न जाने मैं कब उस पोस्ट से डिसकनेक्ट होकर खुद से उलझ बैठा पता ही नही चला..

"क्या हम इंसान पशु हो गये हैं जहाँ स्त्री बस मादा है पुरुष सिर्फ नर !(पशु भी ऐसे कहाँ होते हैं!) कैसे कोई बिना मन से जुड़े किसी के साथ देह बाँट सकता है,कैसे ? क्या हम उसे सुबह होते ही भूल सकते हैं, जिसके साथ रात गुजारी हो| 'मैंने तो पढ़ा है-हर स्पर्श आत्मा की किताब में दर्ज हो जाता है और इंसान उसे जीते -जी नही भूल सकता है | पर हाई सोसाइटी में ऐसी बातें गंवारपन है | क्या भावनाओं का कोई महत्व नहीं| हम कहाँ जा रहे हैं?
हम अपनी आज की पीढ़ी को कैसे समझाये? कैसे कहें की वासना की आग में जितना घी डालो वह उतनी ही तेजी से भभकती है|इच्छाओं का कोई अंत नही| क्यों पुरुष अलग-अलग तरह की स्त्रियों का सुख भोगना चाहता है ? क्या सभी स्त्रियाँ देह के स्तर पर एक सी नहीं है|  अलग-सा सुख बस दिमाग का फितूर है| दिमाग में बनी एक भ्रामक ग्रंथि है| उससे अपने समाज को बचाना होगा| आजकी पीढ़ी का यह भ्रम तोडना होगा की भटकाव में सुख है| दरअसल हम भूल रहे हैं की सुख देह में नही मन में होता है| मजा बदलाव में नही, अपनेपन में महसूस होता है| यही सब सोचते-सोचते जाने कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला| सुबह आँख खुली तो वही ऑफिस की तैयारियों में व्यस्त...ऑफिस पहुँच के कुछ जरुरी काम निपटाने के पश्चात सोचा आप सबके बिच अपने मन की उथल पुथल को रखूं | क्या पता मेरे मन की यह उथल पुथल कईयों की मन की उथल पुथल को शांत करदे|

अपनी राय जरुर दें हमें इन्तेजा रहेगा |
#हिंदी_ब्लॉगिंग

Saturday, 1 July 2017

                                                              विचारों का भंवर 

मैंने ब्लॉगिंग की शुरुआत कब थी मुझे याद नहीं थोड़ा विस्तार में जाके प्रोफाइल देखूं तो पता चला सकता है पर फर्क क्या पड़ता है कब शुरू किये थे इस बात से फर्क तो इस बात से पड़ता है हमारा उद्देश्य क्या था यहाँ तक पहुँचने का पर सच कहूँ तो यूँही कभी किसी रोज गूगल के कहने पे नेक्स्ट नेक्स्ट करते पहुँच गये थे इस ब्लॉगिंग के गलियारे तक| 
एक आधा लाइन लिख भी दिए थे कुछ जोश जोश में फिर गायब हो गये पर इसमें मेरी गलती नही थी कुछ उम्र ही हमारी यही थी जिसमे हर वक़्त मन बदलता है स्थिरता कहाँ होती है हममे..|
पर जब फेसबुक पे फिर से एक बार ब्लॉगिंग डे के बारे में पढ़ा ख़ास करके ताऊ जी http://taau.taau.in/ की बाते खूब असर की मुझपे न भी क्यूँ करे उनकी बात ही लाजवाब होती है जो..
आ तो गया हूँ पर मन न जाने की विचारों के बवंडर में फसा हुआ है क्या करूँगा लिखके मैं? क्यूँ लोग जाने मेरे मन के किसी कोने में छुपे जज़्बात? लोग मेरी जज़बातों को समझ पायेंगे भी या नही? अक्सर यही तो हुआ है मेरे साथ मेरी भावनाएं मेरे जज़बातों का मजाक ही तो बना है |
कहतें हैं हमारी लेखनी हमारे मन का आयना होती है अगर खुदको देखना चाहे तो नजर आ जाते हैं अपने ही शब्दों में कहीं मेरे मन को किसी ने पढ़ के छला तो? कैसे सम्भाल पाऊंगा खुदको? इस तरह के कई  सवालों ने आ घेरा है मुझको..
पर इन विचारों के भंवर पे मिटटी डाल देना ही सही लग रहा है और वही कर रहा हूँ आ चूका हूँ इस ब्लॉगिंग के गलियारे में अपने मन के आयने को शब्दों की शक्ल देने को..उम्मीद है कहीं न कहीं उनमे आप खुद को महसूस करेंगे...

सभी को ब्लॉग दिवस की बहुत बहुत बधाई।#हिंदी_ब्लॉगिंग

Saturday, 12 March 2016

Mohabbat

"Mohabbat"  ek aisi uljhan hai jisme na chahte huye bhi har koi uljhne ki kosis karte hain..par kyun? kabhi smjh nhi paya..jaante hain hum muhabbat dard deti hai..humara sukun humse chhin leti hai..fir bhi is ummid mein hum muhabbat karte hai kya pta hum unme se nikle jinko muhabbat ek nya mukam diya ek nyi unchhai di..jaante hai is baat ki ummid kam hai..par kahi koi ummid to hai..Main aaj se pehle ye maanta tha ki muhabbat ki liye sahi umar ka hona jaruri hota hai kyunki humare andar smjh viksit ho jaati hai..par aaj ek aisi umar ke insaan se muhabbat ki sikh di..jis umar mein main shayad thik se muhabbat bol bhi na pata..tab jaakar kahin mehsus...muhabbat ke liye smjh nhi dil ki jarurat hoti hai..wo dil jo humare sine mein humare janm ke waqt se hi dhadkta hai..

Saturday, 26 December 2015

जलो वहां जहाँ जरुरत हों...उजालों में चरागों के मायने नही होते...!!


"Apne Sapne"

सपनें,ख्वाब जिंदगी में वो शब्द हैं जिनसे हम सभी दो चार होते हैं कभी न कभी ..हर कोई सपना देखता है ! हर किसी के आँखों में एक ख्वाब होती है..इतना तो हम सभी जानते हैं...अगर कुछ नही जानते या यूँ कहूँ की जान-ना नही चाहते..तो वो है औरों के ख्वाब औरों के सपने..हम भूल जाते हैं हमारे सख्वाबों की तरह ही होते हैं दुसरे के भी ख्वाब..वो भी अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए न जाने कितना कुछ करता होगा..क्या कुछ खोता होगा कुछ पाने की छह में...पर अक्सर हम लोग अपनी सपनों अपनी ख्वाबों में इस कदर खो जाते हैं की दूसरों की दुःख दूसरों की दर्द हमें दिखाई ही नही देती..पर हमें बदलना है..इन आदतों को ऐसे कल्चर को जो सिर्फ अपने लिए जीते हैं...हमें एक ऐसी दूनियाँ बनानी है जिसमे हम सब एक हो...मानता हूँ थोडा मुश्किल है..पर नामुमकिन नहीं...हम खुद से ये शुरुआत करते हैं...कहते हैं न एक सही कदम..हजारों मीलों की सफ़र तय कर सकता है....!!तो क्यों न वो पहला कदम हमारा हो....???

Ek Nayi Ummid

Gujarte saal ke saath aane waale naye saal ki ummid apne aap mein ek alag hi ehsaas hai..is bite varsh mein kuchh khwaishen adhuri kuchh sapne adhure...un sapno un khwabon ko aane waale saal mein pura kar le ki zid...kuchh paa lene ki ummid...na jaane kitna kuchh lekar aati hai nya saal.

एक मुहिम:इंसान बनने की

सुबह-सुबह हम इंसान किसी मासूम बच्चे की भांति होते हैं। निश्छल और निस्वार्थ मन,ना कोई लोभ ना कोई मोह,सुबह सो के उठा हुआ इंसान मानो ऐसा लगता ...